shafi

दर्द की शीशी मे दवा रखता हूँ

उनके पास वक्त नहीं था हमारे लिए
चल रहे थे हम जिनका सहारा लिए

मसीहा था वो डूबती कश्ती का मेरी
मगर वो बैठा है हाथों में किनारे लिए

मेरे घर की मुंडेर के चिराग बुझा दिए
मैं खड़ा था उसके घर में सितारे लिए

उसके दर्द में हमारी आंखों में नमी थी
पर वो मिला मुझे दिल में अंगारे लिए

जब कभी दिल की बात कहता “शफी”
खुद में उलझ जाता उलझे इशारे लिए

II

कुछ अलग सी अदा रखता हूँ
दर्द की शीशी मे दवा रखता हूँ

हर शख्स झुकाए सर आता है
दिल-ए-दर पर खुदा रखता हूँ

निभाता हूँ तो दिल-ए-जान से
वरना खुद को जुदा रखता हूँ

खुबसूरत हो नजर नहीं हटती
न सोच तुम पे निगाह रखता हूँ

लब मुस्कुराते है मेरे “शफ़ी” जब
लबों पे किसी की दुआ रखता हूँ

III

लोग बदल रहे हैं मौसम की तरह
शोला दिखता है शबनम की तरह

दम निकाल लेता है बात बात पर
रहता है जो साथ हमदम की तरह

घाव दे जाता है अक्सर ज़ख्म पर
दिखता है हमें जो मरहम की तरह

जिनको समेट कर रखते हैं खुद मे
छोड़ देते हैं वो हमे बरहम की तरह

आंखो में नमी दे जाते हैं वो “शफी”
रखते हैं जिन्हे हम पुनम की तरह

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