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मेरी चेतना के स्वर

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बात दवा बन मित्र की, दर्द करे सब दूर।
मित्र नहीं वह शत्रु जो, ख़ुशी लूट ले पूर।।

जाति धर्म अरु क्षैत्र से, बने नहीं पहचान।
कर्म सभी से ऊँच हैं, सदियों जिनके गान।।

हाथों बीच लकीर हैं, स्वयं भरें हम रंग।
इंद्रधनुष कर भाग्य को, करें सभी को दंग।।

भूला कब हूँ आपको, करूँ कभी जो याद।
प्रेम आपसे रूह का, रखे मुझे है शाद।।

भेद चंद्र करता नहीं, रखे सूर्य भी मेल।
प्रीत पृथ्वी से कह रहा, नित दोनों का खेल।।

सुबह सुहानी आपकी, बने दिवस नमकीन।
रंगीली संध्या रहे, बीते रात्रि हसीन।।

स्वप्न खिलेंगे आपके, मानो जैसे फूल।
जोश तरीक़ा होश से, समय बने अनुकूल।।

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