मैंने मेरी ज़िन्दगी को जैसा भी जिया – एक बात को मैंने जरूर समझा और वह था विश्वास और समर्पण। हंसी आ रही होगी ना सुनकर, वाकई हम स्त्रियों को यही बातें तो सिखाई जाती है कूट कूट कर। लोगो को अजब सा भरम रहता है की अगर हम यह सब ना सीखे तो शायद कोई बहुत बड़ा कहर नाज़िल हो जायेगा इस, एक ना एक दिन फना हो जाने वाले जहान पर।
कितने खौफनाक शब्द है ना यह – विश्वास, समर्पण!! ये शब्द गहरे अर्थ को लिए है पर इन्हे बड़ा ही संकुचित तरीके से बताया गया हमे। हमसे ही क्यों तवक्को है कि इस झूठे समाज के सामने विश्वास और समर्पण के नाम पर घुटते और मरते रहे? जिस पर विश्वास करने कि कोशिश कि, उसने समझा कितनी कमज़ोर है और सिर्फ समझा ही नहीं, हमे जताया भी गया कि हम कमज़ोर है। उसी विश्वास के नाम पर हमे छला गया इन्ही हमारे विश्वासपात्रो के द्वारा।
जिनके प्रति समर्पण रखा उन्होंने पैरो की जूती बना दिया। मेरे घर में एक जूते रखने की अलमारी है। मैं उन्हें देखती की कैसे इन जूतों को बाहर जाने से पहले बड़ा पोलिश लगाकर चमकाया जाता और फिर उन्हें बड़ी बेदर्दी से भरी महफ़िल में रौंदा जाता और घर आकर यूँ ही कही उन्हें फ़ेंक दिया जाता। मैंने अपने आपको एक जूता समझ लिए एक दिन – मेरी ज़िन्दगी उससे बहुत मिलती थी। मेरा समर्पण इतना था की लोगो के द्वारा मेरा रौंदना मुझे मेरा फ़र्ज़ ही लगा।
फ़र्ज़ और प्यार शायद साथ साथ नहीं चल सकते क्योकि फ़र्ज़ के पीछे एक गहरी ख्वाहिश होती है। अगर फ़र्ज़ में थोड़ी सी भी कमी रह जाये तो क्या पता उसी जूते की तरह कबाड़ी के पास फ़ेंक दी जाऊँ। इसी सफर में अचानक कोई मिला मुझे – कुछ अनमना, कुछ बेबूझ – विश्वास और समर्पण लिए हुए। खोया हुआ जैसे कुछ ऐसा पाया हो उसने की शायद बांटने से डरता हो। वह कुछ नज़दीक आया तो सारे अर्थ से बदल गए अचानक। जो सीखा था, सब गुमशुदा हो गया।
उसने मुझे खुला आसमान दिया उड़ने के लिए, और मैं उसके मुझ पर रखे हुए विश्वास को देखते हुए उस आसमान में उड़ जाती। वह मेरी राह तकता होगा, इस सोच में एक छोटी सी परवाज़ लेकर मैं वापिस लौट आती। वह वही होता मुस्कराते हुए, उसे देखकर मैं भी मंद=मंद मुस्करा जाती। मैंने कभी उसे अपना दर्द नहीं बताया पर जब वह कहता की ठीक नहीं हो तुम आज – उसे कैसे पता चलता है मेरी तकलीफ का? यह सोच कर मैं मेरा दर्द भूल जाती। वह कहता रहता है की हवा के झोंके सा हूँ मैं, शायद गुजर जाऊंगा मै। उसकी ऐसी बातें सुनकर मैं घबरा जाती पर जब वह कहता, मैं यही हूँ तुम्हारे साथ पागल – मैं हंस देती और अपनी किस्मत पर इतरा जाती। वो कोई नहीं है मेरा पर फिर भी क्या सच में कोई रिश्ता नहीं है मेरा उसके साथ – ऐसे सवालो में उलझ जाती। वह मुझे जब भी कुछ करने को दिल से कहता – मैं बिना सवाल पूछे चुपचाप उसे कर जाती। किसी ने नहीं बताया की मुझे उस पर विश्वास करना है या नहीं – वह हो गया, पता नहीं क्यों? लोग कहते है कि तुम अर्धागिनी सी लगती हो उसकी – जब साथ चलती हो तो लगता है कितने समर्पित साथी है दोनों?
हमारा समर्पण बिना रिश्ते कैसे हो गया, कोई बताएगा मुझे ?
बड़े पत्थर को अगर तराशोंगे
तो कुछ पत्थर अलग होगा
और उस पर छीनी चलाते हुए
शिल्पकार को दर्द नहीं होना चाहिए
क्यों रोता है तू शिल्पकार छिनी चलाते हुए
तेरे तराशे हुए पत्थर को लोग संसार की सुन्दरतम कलाकृति कहेंगे
जमाने को भले ही तेरा नाम न पता हो
तो क्या हुआ
लेकिन इस मूर्ति को पता है
कि उसका खुदा कौन है?